Migrant Workers Live | Migrant Workers News Update | Migrant Workers Mumbai (Bombay) Banaras Coronavirus Covid-19 Lockdown LIVE News Today Latest News Updates | मप्र के बाद नजर नहीं आ रहे पैदल मजदूर; जिस रक्सा बॉर्डर से दाखिल होने से रोका, वहीं से अब रोज 400 बसों में भर कर लोगों को जिलों तक भेज रहे हैं

  • ऐहतियात के नाम पर सोशल डिस्टेंसिंग तो नहीं, हां रक्सा बॉर्डर से निकली बस में मजदूरों को बैठाने से पहले उनके हाथों पर सेनिटाइजर जरूर छिड़का जा रहा था
  • मजदूरों के लिए 60 लोग रोज बना रहे हैं खाना, लाउडस्पीकर से अनाउंसमेंट होता है और फिर जिले के मुताबिक मजदूरों की कतार लगवाई जाती है

विनोद यादव और मनीषा भल्ला

May 19, 2020, 08:58 AM IT

मुंबई. दैनिक भास्कर के जर्नलिस्ट बंबई से बनारस के सफर पर निकले हैं। उन्हीं रास्तों पर जहां से लाखों लोग अपने-अपने गांवों की ओर चल पड़े हैं। नंगे पैर, पैदल, साइकिल, ट्रकों पर और गाड़ियों में भरकर। हर हाल में वे घर जाना चाहते हैं, आखिर मुश्किल वक्त में हम घर ही तो जाते हैं। हम उन्हीं रास्तों की जिंदा कहानियां आप तक ला रहे हैं। पढ़ते रहिए..

आठवीं खबर, रक्सा बॉर्डर, झांसी से:
मध्य प्रदेश से हम उत्तरप्रदेश में झांसी जिले के रक्सा बॉर्डर से दाखिल हुए। वजह यह थी कि लॉकडाउन बढ़ने पर जब प्रवासी मजदूरों ने इसी रक्सा बॉर्डर से अपने जिलों में जाने के लिए दाखिल होना चाहा, तो पुलिस ने उन्हें रोका था। मगर अब इसी बॉर्डर से हर दिन 300 से 400 बसों में बैठाकर मजदूरों को गोरखपुर, वाराणसी और जौनपुर सहित सूबे के अलग-अलग जिलों में छोड़ा जा रहा है।

आरआई आरटीओ झांसी महेंद्र बाबू बताते हैं कि चूंकि यहां बड़ी संख्या में मजदूर आ रहे हैं। इसलिए 55-60 लोगों को रसोई में खाने की व्यवस्था में लगाया गया है। रोज सुबह  6 बजे से लोगों को फूड पैकेट बांटना शुरू होता है और रात 10-11 बजे तक चलता है। शुरुआत में 16 हजार फूड पैकट खप जाता था। मगर अब मजदूरों की संख्या कम हो रही है और लगभग 10 हजार फूड पैकेट रोज बांट रहे हैं।
मध्य प्रदेश सरकार अपने राज्य से प्रवासी मजदूरों को अपनी बसों से इसी बॉर्डर से कुछ दूर लाकर छोड़ती है। फिर मजदूरों को उनके जिले की जानकारी लेकर वहां जाने वाली बसों में बैठाया जाता है।

यहीं से हमें दो बसें देर शाम को मोदी के संसदीय क्षेत्र बनारस के लिए रवाना होते हुए दिखी। इस बस में 46 लोगों को बैठाया गया था। मुख्यमंत्री योगी के गोरखपुर को छूटने वाली बस भी खचाखच भरी हुई थी। दो-तीन यात्री बस में खड़े भी दिखे।

रक्सा बॉर्डर से निकली किसी भी बस में सोशल डिस्टेंसिंग जैसी कोई बात नजर नहीं आई। हां, मजदूरों को बसों में बैठाने से पहले उनके हाथों पर सेनिटाइजर जरूर छिड़का जा रहा था। वाराणसी और गोरखपुर जैसे कई जिलों की दूरी झांसी से 550-600 किमी है यही वजह है कि बस में दो ड्राइवर रखे जा रहे हैं।

मजदूरों को उनके जिलों की बसों में बैठाने के लिए लगातार लाउडस्पीकर से सूचनाएं दी जा रही थी। यहां एक मंच भी बनाया गया है। जिस पर देर शाम बबीना क्षेत्र के विधायक राजीव सिंह परीछा और जिले के आला अफसर मौजूद थे। मगर मंच के सामने मजदूरों की जो कतार लगवाई गई थी। उसमें दो गज के फासले के अनुशासन का पालन होता नहीं दिख रहा था।

मंच पर भी जो सरकारी अधिकारी विधायक के आस-पास बैठे थे। वे भी सोशल डिस्टेंसिंग का पालन लगभग नहीं ही कर रहे थे। विधायक राजीव सिंह बताते हैं कि रक्सा बॉर्डर पर रोजाना बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर आ रहे हैं। इसलिए अब झांसी रेलवे स्टेशन से मजदूरों को ले जाने वाली ट्रेन भी शुरू होने वाली है।

आशीष बाल्मीकि और उनके साथ 40 सफाईकर्मी साथी रक्सा बॉर्डर पर सफाई के काम में लगे हुए हैं। वे दोपहर तीन बजे वाली शिफ्ट में आते हैं। रात 11 बजे तक काम करते हैं। जबकि पहली शिफ्ट सुबह 8 बजे से शुरू होती है। यहां रोजाना करीब चार ट्रॉली भरकर कचरा निकलता हैं। लॉकडाउन के बावजूद नगर निगम द्वारा इनकी पगार में कटौती नहीं की है। इस बात से उत्साहित सफाई कर्मी कोरोना वॉरियर बनकर काम कर रहे हैं।

लेकिन ऐसा उन स्कूल ड्राइवरों के साथ नहीं हुआ है। राजन सिंह स्थानीय मून स्कूल के ड्राइवर हैं। उनकी स्कूल की बसें भी इन दिनों मजदूरों को घर पहुंचाने में लगी हैं। वे भी बांदा-हमीरपुर लगभग 200 किमी तक बस चलाते हैं। कई स्कूलों के ड्राइवरों का वेतन स्कूल ने आधा कर दिया है। सैलरी कट रही है इस दुख के बावजूद वे लोग मजदूरों को उनके जिले में बसों से पहुंचा रहे हैं।
मज़दूरों को घर पहुंचाने के लिए जिन प्राइवेट बसों और प्राइवेट स्कूल की बसों का इंतज़ाम किया गया है उन्हें पूरा डीज़ल भी नहीं दिया जा रहा है। बस ड्राइवरों का आरोप है कि एक स्थान पर मज़दूरों को छोड़ने के बाद हमें वहीं से मज़दूरों के साथ आगे भेज दिया जाता है लेकिन डीज़ल हमारे पास उतना नहीं होता है।

बस ड्राइवर मसरूर खान बताते हैं कि मान लीजिए कि हमें मज़दूरों को छोड़ने के लिए 100 किलोमीटर जाना है लेकिन हमें डीज़ल 60 किलोमीटर का ही दिया जाता है। इसके लिए इन ड्राइवरों को अपने मालिकों से लड़कर डीज़ल लेना पड़ रहा है। लगभग 250 प्राइवेट बसें इस काम में लगाई गई हैं। सरकारी बसें भी लगाई गईं हैं। लेकिन दिक्कत प्राइवेट बस वालों को है।
स्कूल बस ड्राइवरों का कहना है कि इनमें से किसी को अगर इंफेक्शन होता है तो इनकी नौकरी भी चली जाएगी । हालांकि स्कूल बस चालकों को बहुत दूर नहीं भेजा जाता लेकिन उनका कहना है कि जहां भी भेजा जाता है वहां तक के लिए वह डीज़ल पूरा नहीं होता है।  

इस बॉर्डर से उत्तर प्रदेश के बनारस, भदोई, आजमगढ़, अयोध्या, मऊ, कानपुर, फैज़ाबाद यानी तकरीबन हर जगह के लिए बसे हैं। दूधनाथ डिग्री कॉलेज की स्कूल बस के ड्रावर राजू गोस्वामी का कहना है कि हम लोग पूरा दिन और पूरी रात काम कर रहे हैं। रात होने तक इस बॉर्डर पर एक लाख तक मज़दूर इक्टठा हो जाते है। हल्ला होने लगता है तो ड्राइवरों को बस लेकर रात को बी निकलना पड़ता है।

ग्रामोद्योग स्कूल बस के ड्राइवर नरेंद्र तो काफी परेशान हैं। उनका कहना है कि उन्हे दो महीने से स्कूल की ओर से तनख्वाह नहीं मिली है। ऊपर से वह दिन रात काम में लगे हैं।
बसों में चढ़ने के लिए धक्का-मुक्की हो रही है। लोग छोटे छोटे बच्चों को खिड़कियों से फेंक कर बस के अंदर जगह रोक रहे हैं। 52 सीट वाली बस में लोग खड़े होकर भी जा रहे हैं। बनारस जा रहे कमल बता रहे हैं कि वह वैसे भदौही रहते हैं। लेकिन बनारस की बस मिली है। लेकिन उन्हें घर जाने की इतनी जल्दी है कि बनारस से भदौही कैसे भी पैदल चले जाएंगे।बंबई से बनारस तक

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पहली खबर: 40° तापमान में कतार में खड़ा रहना मुश्किल हुआ तो बैग को लाइन में लगाया, सुबह चार बजे से बस के लिए लाइन में लगे 1500 मजदूर

दूसरी खबर: 2800 किमी दूर असम के लिए साइकिल पर निकले, हर दिन 90 किमी नापते हैं, महीनेभर में पहुंचेंगे

तीसरी खबर: मुंबई से 200 किमी दूर आकर ड्राइवर ने कहा और पैसे दो, मना किया तो गाड़ी किनारे खड़ी कर सो गया, दोपहर से इंतजार कर रहे हैं

चौथी खबर: यूपी-बिहार के लोगों को बसों में भरकर मप्र बॉर्डर पर डंप कर रही महाराष्ट्र सरकार, यहां पूरी रात एक मंदिर में जमा थे 6000 से ज्यादा मजदूर

पांचवीं खबर: हजारों की भीड़ में बैठी प्रवीण को नवां महीना लग चुका है और कभी भी बच्चा हो सकता है, सुबह से पानी तक नहीं पिया है ताकि पेशाब न आए

छठी खबर: कुछ किमी कम चलना पड़े इसलिए रफीक सुबह नमाज के बाद हाईवे पर आकर खड़े हो जाते हैं और पैदल चलने वालों को आसान रास्ता दिखाते हैं
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